महेंद्र सिंह धोनी के क्रिकेट से संन्यास लेने के अगले दिन ही बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने खुलासा करते हुए बताया कि कैसे उन्हें साल 2011 विश्वकप जिताने के बावजूद चयनकर्ता टीम की कप्तानी से हटाना चाहते थे। तब उन्होंने आगे आकर धोनी का पक्ष लिया और उन्हे टीम का कप्तान बरकरार रखा।
दरअसल, साल 2011 विश्वकप जीतने के बाद धोनी की कप्तानी वाली टीम इंडिया को ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टेस्ट सीरीज में 0-4 से हार का सामना करना पड़ा था। जिसके बाद चयनकर्ताओं का पैनल धोनी को कप्तानी से बिना किसी बैकअप के आगे आने वाली श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ट्राई वनडे सीरीज से हटा देना चाहता था। ऐसे में श्रीनिवासन ने सबके खिलाफ जाकर धोनी के टीम में बने रहने का ऐलान किया।
श्रीनिवासन ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, "साल 2011 में भारत ने विश्वकप जीता था। उसके बाद हमारी टीम ने ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टेस्ट सीरीज में अच्छा नहीं किया था। इस तरह चयनकर्ताओं के पैनल में से एक चयनकर्ता धोनी को वनडे क्रिकेट की कप्तानी से हटा देना चाहते थे। ऐसे में चर्चा का विषय ये था कि आप उन्हें वनडे की कप्तानी से कैसे हटा सकते हैं जबकि कुछ ही महीनों पहले उन्होंने विश्वकप जीता है। इतना ही नहीं उन्हें धोनी के रिप्लेसमेंट तक के बारे में जानकारी नहीं थी। जिसके बाद फिर मैंने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।"
श्रीनिवासन ने आगे कहा, "मेरे ख्याल से छुट्टी का दिन था। मैं गोल्फ खेल रहा था। तभी संजय जगादले जो उस समय बीसीसीआई सेक्रेटरी थे मेरे पास आए और बोले कि सर चयनकर्ताओं ने उन्हें कप्तान बनाने से नकार दिया है लेकिन टीम में शामिल करने का फैसला किया है। उसके बाद मैं आया और मैंने कहा धोनी कप्तान रहेगा। मैंने तब बीसीसीआई के अध्यक्ष होने का फायदा उठाया।"
बता दें कि विश्वकप जिताने के बाद टीम इंडिया को अगली दोनों टेस्ट सीरीज में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जिसमें ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के खिलाफ टीम इंडिया लाल गेंद के खेल में कहीं टिक नहीं पाई। यही कारण था कि आगे जाकर धोनी ने साल 2014 में अचानक टेस्ट क्रिकेट से संन्यास का ऐलान कर दिया और विराट कोहली ने टीम की बागडोर संभाली।
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15 अगस्त को 74वें स्वतंत्रता दिवस पर जहां सभी आजादी का जश्न मना रहे थे उसी शाम टीम इंडिया के पूर्व कैप्टन कूल महेंद्र सिंह होनी और उनके चेहते खिलाड़ी व दोस्त सुरेश रैना दोनों ने एक साथ संन्यास का ऐलान कर दिया था। ऐसे में सभी फैंस जहां आजादी वाले दिन भाव विभोर हो गए वहीं सबके मन में एक ही सवाल चल् रहा था कि संन्यास के लिए 15 अगस्त को क्यों चुना।
भारत के लिए 18 टेस्ट, 226 वनडे और 78 टी-20 खेलने वाले रैना ने दैनिक जागरण को दिए इंटरव्यू में कहा, "हम दोनों ने पहले से ही शनिवार को संन्यास लेने की योजना बना ली थी। धोनी की जर्सी का नंबर 7 है और मेरी जर्सी का नंबर 3, दोनों मिलाकर 73 होते हैं। शनिवार को भारत की स्वतंत्रता के 73 वर्ष पूरे हुए तो हमने सोचा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदा लेने का इससे बेहतर दिन और कोई नहीं हो सकता।"
गौरलतब है कि धोनी ने 23 दिसंबर 2004 में टीम इंडिया में कदम रखा और अपने पहले मैच में वो शून्य बना रन आउट होकर चलते बने थे। हलांकि उसके बाद धोनी ने कई शानदार पारिया खेली और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जिसके चलते वो भारत को आईसीसी की तीनो ट्रॉफी ( 2007 टी20 विश्वकप, 2011 विश्वकप और 2013 चैम्पियंस ट्राफी ) जिताने वाले एकमात्र कप्तान भी बने।
ऐसे में धोनी के बारे में रैना ने कहा, "धोनी ने 23 दिसंबर 2004 को बांग्लादेश के खिलाफ चटगांव में तो मैंने 30 जुलाई 2005 को श्रीलंका के खिलाफ दांबुला में पहला अंतरराष्ट्रीय वनडे खेला था। हम दोनों का करियर 15-16 साल का रहा। हमने लगभग एक साथ ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना शुरू किया। चेन्नई सुपर किंग्स (सीएसके) में हमेशा साथ रहे तो अब संन्यास भी साथ लिया और आगे आइपीएल भी साथ खेलते रहेंगे।"
रैना ने आगे कहा, "अब हम आइपीएल खेलेंगे ताबड़तोड़ तरीके से। हर गेंद पर अब खुलकर छक्के लगेंगे।"
बता दें कि रैना और धोनी को भारतीय क्रिकेट में जय और वीरू की जोड़ी भी कहा जाता है। उन्होंने कहा मुझे पता था कि धोनी चेन्नई में संन्यास लेंने आ रहे हैं तो मैंने भी खुद को पूरी तरह से तैयार कर लिया था। इस तरह मैं सीएसके के चार्टर्ड प्लेन से 14 अगस्त को पीयूष चावला, दीपक चाहर और कर्ण शर्मा के साथ रांची पहुंचा। वहाँ हमने 15 अगस्त को संन्यास की घोषणा की और उसके बाद गले मिलकर दोनों खूब रोए। अब ये दोनों की जोड़ी आईपीएल में देखने को मिलेगी जिसका फैन्स को बेसब्री से इंतज़ार है।
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भारतीय क्रिकेट से एक साल पहले जहां युवराज सिंह ने संन्यास ले लिया था वहीं उनके साथ मध्यक्रम में खेलकर टीम इंडिया को कई एक मैच जिताने वाले पूर्व कैप्टन कुल महेंद्र सिंह धोनी ने भी संन्यास ले लिया है। 15 अगस्त को 74वें स्वतंत्रता दिवस पर जहां सभी आजादी का जश्न मना रहे थे उसी शाम धोनी ने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट से अचानक संन्यास लेकर सभी को चौका दिया। ऐसे में टीम इंडिया के पूर्व तेज गेंदबाज और धोनी के डेब्यू मैच में खेलने वाले अजीत अगरकर का मानना है कि धोनी और युवराज की जोड़ी ने वनडे क्रिकेट में चेस ( रनों का पीछा ) करने का तरीका बदल दिया।
अगरकर ने कहा, "धोनी और युवराज ने वनडे क्रिकेट में चेस करने का तरीका बदल दिया है। उन्होंने दूसरी पारी में शानदार खेला दिखाया जिन्हें देखकर अन्य टीमें भी टॉस जीतने के बाद चेस करना पसंद करने लगी।"
इतना ही नहीं अगरकर ने धोनी की दो शतकीय पारियों को याद करते हए कहा, "साल 2005 में जयपुर में श्रीलंका के खिलाफ धोनी के द्वारा खेली गई 183 रनों की नॉट आउट पारी और उसके बाद लाहौर में पाकिस्तान के खिलाफ चेस करते हुए ( साल 2006 ) उनकी पारी आज भी याद है। श्रीलंका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 4 विकेट पर 298 रनों का टोटल रखा था, जिस मैच में धोनी तीन नम्बर पर बल्लेबाजी करने उतरे और आसानी से भारत को मैच जिता दिया। जिसके बाद ड्रेसिंग रूम में सभी पागल हो गए थे जब उन्होंने छक्के मारना शुरू किए। जबकि लाहौर में भी पाकिस्तान ने 288 रनों का लक्ष्य रखा था और धोनी (72 नाबाद रन) ने उस मैच को अपने अंदाज में खत्म किया था। इस मैच में उन्होने युवराज के साथ काफी लम्बी साझेदारी निभाई थी।"
आगरकर ने अंत में कहा, "वह एक प्यारा लड़का है जो ड्रेसिंग रूम में सभी के साथ घुल-मिल जाएगा। उन्होंने कहा, 'वह इस तरह से जब भी मिलता है विनम्र होता है।"
बता दें कि धोनी और युवराज की जोड़ी ने एक दशक तक भारतीय वनडे क्रिकेट में अपना दबदबा बनाए रखा। ये दोनों ही खिलाड़ी पूर्व कप्तान सौरव गांगुली की कप्तानी में निखाकर सामने आए थे और आगे चलकर दोनों ने काफी नाम कमाया। धोनी जहां भारत को आईसीसी की तीनो ट्रॉफी ( 2007 टी20 विश्वकप, 2011 विश्वकप और 2013 चैम्पियंस ट्राफी ) जिताई। वहीं युवराज ने भी टी20 क्रिकेट में 6 गेंदों में 6 छक्के जबकि 2011 के विश्वकप में वो प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे थे। इस तरह धोनी को ट्रॉफी जिताने में युवराज सिंह का भी काफी योगदान रहा है।
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दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबदार नहीं हूँ ये पंक्ति शायद अकबर इलाहाबादी मानो धोनी के जीवन पर लिखकर गए हो। इस तरह का अंदाज ही महेंद्र सिंह धोनी के शानदार क्रिकेट करियर में उनकी सादगी के साथ चार चाँद लगाता है। भारत को क्रिकेट के मैदान में हर एक खिताब जिताने के बाद वो छोड़ देते हैं भीड़, उन्माद और कोलाहल को लेकिन सभी फैन्स की निगाहें उन्हें ही ढूँढती हैं। क्रिकेट के खेल में चपलता और मास्टरमाईंड से धोनी ने पूरी दुनिया को अपने कदमों के आगे झुका दिया मगर इस बात का गुरूर धोनी ने कभी सामने आने नहीं दिया। यही कारण है साल 2004 से क्रिकेट की दुनिया में शून्य से शुरू करने वाले धोनी ने तमाम उपलब्धियों को हासिल कर 74वें स्वतंत्रता दिवस पर क्रिकेट को अलविदा कहकर करोड़ों खेल प्रेमियों को भाव विभोर कर दिया।
जहां एक तरफ सभी ( 15 अगस्त ) आजादी का जश्न मना रहे थे उसी शाम धोनी ने, मैं पल दो पल का शायर हूँ और पल दो पल मेरी कहानी हैं।।।इन पंक्तियों के साथ अचानक से क्रिकेट को अलविदा कहकर जता दिया कि उन्हें अपने संन्यास के लिए किसी बड़े भव्य समारोह की जरूरत नहीं है। जिस तरह शांति पूर्ण ढंग से धोनी ने अपनी क्रिकेट की दुनिया का आगाज किया ठीक उसी अंदाज में अंजाम भी दिया।
साल 2004 में जब धोनी ने क्रिकेट के मैदान में कदम रखा उस समय भारतीय क्रिकेट के युवा खिलाड़ी पूर्व कप्तान सौरव गांगुली की कप्तानी में निडर होकर खेलना तो सीख गए थे लेकिन बड़े टूर्नामेंट और खिताबों को कैसे अपने नाम करना है। इस पर धोनी ने अपनी मुहर लगाई।
शून्य के बावजूद मिला मौका
बांग्लादेश के खिलाफ पहले मैच में धोनी मैदान में उतरें और जीरो (शून्य) पर रन आउट होकर पवेलियन की तरफ बढ़ते हुए उनके चेहरे पर तो मुस्कान थी लेकिन मन में कुछ कर गुजरने का गुबार जरूर फूट रहा होगा। उस मैच को मैं रेडियों पर सुन रहा था क्योंकि उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में उन दिनों लाइट काफी जाती थी। लेकिन क्रिकेटिया परिवार से होने के नाते हम सभी करीब 8 से 10 लोग इस लम्बे वाल लड़के के खेल को नहीं देख तो सुनना जरूर चाहते थे। इससे पहले हमारे बीच काफी चर्चा थी कि टीम इंडिया में एक लम्बे बाल वाला लड़का आया है जो बहुत लम्बे - लम्बे छक्के मारता है। इतना ही नहीं वो छक्का मारकर मैच भी जिताता है। लेकिन उनके पहले मैच में ही रन आउट होकर पवेलियन जाने से सभी काफी निराश थे और मन में चिंता थी कि अगले मैच में उन्हें हम टेलीविजन पर देख पायेंगे भी या नहीं।
MS Dhoni
हलांकि उस समय टीम इंडिया के कप्तान रहे सौरव गांगुली को इस लम्बे बॉल वाले विकेटकीपर बल्लेबाज पर काफी भरोसा था। जिसके बाद धोनी को लगातार मौका मिला और फिर उन्होने पाकिस्तान व श्रीलंका के खिलाफ क्रमशः 148 व 183 रनों की तूफानी पारी खेल साबित कर दिया कि रांची के मैदानों में छक्के बरसाने वाला माहि अब टीम इंडिया का उभरता सितारा धोनी बन चुका है।
2007 में बने भारतीय क्रिकेट का चिराग
2004 के बाद धोनी टीम इंडिया में प्रमुख विकेटकीपर बल्लेबाज के रूप में बने रहे। उसके बाद बारी थी आईसीसी विश्वकप 2007 की। तब तक धोनी अच्छी तरह से सभी खेल प्रेमियों के मन में अपना घर बना चुके थे। अब इस विश्वकप में सचिन, गांगुली, सहवाग, द्रविड़, युवराज और धोनी जैसे सितारों के होने से फैन्स को जीत की काफी उम्मीद थी। मगर इसके विपरीत टीम इंडिया को बांग्लादेश जैसी छोटी टीम से करारी हार हेलनी पड़ी और ग्रुप मैचों से ही टूर्नामेंट से बाहर होना पड़ा। ये बात फैन्स को बिल्कुल भी रास नहीं आई और पूरे भारत में सभी खिलाड़ियों के घर के बाहर फैन्स ने पत्थरबाजी और टीम इंडिया की नाकामी में विरोध जताया। कई खिलाड़ियों के पुतले भी फूंके गए।
इस तरह भारतीय क्रिकेट में बढ़ते अँधेरे के बीच आईसीसी ने एक और नया टूर्नामेंट टी20 विश्वकप उसी साल साउथ अफ्रीका में कराने का ऐलान कर डाला। ये समय टीम इंडिया के लिए और चैलेंजिंग तब हुआ जब सचिन, सौरव, और द्रविड़ जैसे सीनियर खिलाड़ियों ने इसमें खेलने से इंकार कर दिया।
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ऐसे में ग़ालिब की ये पंक्ति उस समय भारतीय क्रिकेट की दशा पर फिट बैठती है कि कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई राह नजर नहीं आती। जिसका मतलब था कि जब सामने अँधेरा हो तो कोई राह नजर नहीं आती है कि किस दिशा में जाए। तभी टीम मैनेजमेंट ने सहवाग और युवराज जैसे सीनियर खिलाड़ियों को दरकिनार कर धोनी के कन्धों पर कप्तानी का भार डाला। धोनी ने मिलने वाली जिम्मेदारी को बिना कुछ कहे स्वीकारा और टीम के खिलाड़ियों के साथ तैयारी करना शुरू कर दिया। हलांकि वो भारतीय क्रिकेट के अँधेरे में चिराग बने और इस विश्वकप के फ़ाइनल मैच में उन्होंने पाकिस्तान को हराकर भारतीय फैन्स को दोहरी ख़ुशी दे डाली। पहली ये कि हम विश्वकप जीते और भारतीयों की दूसरी सबसे बढ़ी ख़ुशी ये थी कि हम पाकिस्तान को हराकर जीतें।
टी20 विश्वकप जीत का जश्न
साउथ अफ्रीका में जैसे ही भारत ने धोनी की कप्तानी में विश्वकप जीता उसके जश्न में पूरा भारत डूब गया था। मुझे याद है उस समय पूरे भारत के क्रिकेटिया फैन्स की तरह हम भी बारिश के बीच कानपुर की गलियों में ढोल और ताश लेकर बांग्लादेश से मिली हार को भूलकर, पाकिस्तान व विश्वकप में मिली जीत को दोहरी ख़ुशी का जश्न मना रहे थे। उस समय ऐसा लगा मानो धोनी ने हम जैसे फैन्स के दिलों में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया हो और भारतीय क्रिकेट के फर्श से अर्श में जाने का सिलसिला शुरू हो चुका हो।
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इस पर बशीर बद्र की एक पंक्ति याद आती है कि जिस दिन से चला हूँ मंजिल पर निगाह है मेरी, आखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा। इसी तरह विश्वकप में मानी जा रही कमजोर टीम इंडिया के कप्तान धोनी ने अपनी निगाह सिर्फ विश्वकप पर रखी और उसके रास्ते में पड़ने वाले रोड़ों को पार करते चले गए।
सिग्नेचर शॉट से दिलाई भारत को 2011 विश्वकप जीत
इस विश्वकप के बाद फिर धोनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और उन्होंने अपना अगला निशाना साधा आईसीसी के 50-50 ओवर विश्वकप व क्रिकेट के सबसे बड़े टूर्नामेंट पर। साल 2011 तक धोनी भी अपनी कप्तानी से लेकर खेल तक सभी कलाओं में 16 कला संपन्न हो चुके थे। जिसके चलते उन्होंने इस बार अपने ही देश मे छक्का मारकर मैच जिताने वाले अंदाज में 28 साल बाद भारत को क्रिकेट का दूसरा विश्वकप जिताया। मुंबई के मैदान में जैसे ही धोनी ने अपने सिग्नेचर शॉट से छक्का मारकर मैच जिताया मुंबई समेत पूरा देश जाम में फंस गया। पूरे भारत में दिवाली मनाई गई सभी ने भारत के जीतने पर पटाखे जलाए। ऐसा हो भी क्यों न आख्रिकार 1983 के बाद पहली बार भारत आधुनिक क्रिकेट में किंग बनकर जो उभरा था। इन सबमें धोनी का काफी योगदान रहा जिन्होंने 2007 के बाद 4 सालों में ऐसी टीम का निर्माण किया जो आगे चलकर विश्व चैम्पियन बनी।
2013 चैम्पियंस ट्रॉफी जीतकर हासिल किया ये मुकाम
धोनी ने विश्वकप 2011 तो जीत लिया था लेकिन उनकी नजरों में अब एक चीज और खटक रही थी। वो था, आईसीसी का तीसरा टूर्नामेंट चैम्पियंस ट्राफी, जो साल 2013 में इंग्लैंड में खेली जानी थी। धोनी की टीम ने इंग्लैंड के लिए उड़ान भरी और अंग्रेजों की सरजमीं पर ट्रॉफी जीतकर टीम इंडिया वापस लौटी। इस तरह भारतीय फैंस पर धोनी ने ये तीसरी ख़ुशी न्यौछावर कर दी। जिसके चलते वो दुनिया के एकमात्र ऐसे कप्तान बने जिन्होंने तीनों आईसीसी ट्राफी अपने नाम की।
धोनी की कप्तानी
इस तरह सौरव गांगुली की कप्तानी में जहां टीम इंडिया ने निडर होकर खेलना तो सीख लिया था मगर बड़ें टूर्नामेंट में कैसे अपने फैसलों पर भरोसा करना है व खिलाड़ियों को कैसे जीत के लिए प्रेरित करना है ये धोनी ने सिखाया। धोनी के करियर में कई ऐसे फैसले रहे जिस पर सभी हैरान रह गए। जैसे टी20 विश्वकप 2007 का अंतिम ओवर जोगिन्दर शर्मा को दे देना प्रमुख रूप से शामिल है। इतना ही नहीं टीम इंडिया में फिटनेस और फील्डिंग का पाठ भी धोनी लेकर आगे आए। जिसे उनके उत्तराधिकारी विराट कोहली आज भारतीय क्रिकेट के लिए बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं। इस तरह धोनी ने अपनी कप्तानी में देखा जाए तो शांत रहते हुए सिर्फ हुनर के बल पर एक नए भारतीय क्रिकेट का निर्माण किया जिसकी जड़ें काफी गहरी हो चुकी है। इस पर एक पंकित याद आती है कि वही लोग खामोश रहते हैं अक्सर, जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं।
रन आउट से रन आउट तक
MS Dhoni
पिछले साल 2019 विश्वकप को वैसे भी धोनी का आखिरी विश्वकप कहा जा रहा था। जिसे टीम इंडिया जीतना चाहती थी मगर न्यूजीलैंड के खिलाफ उस मैच में धोनी के रन आउट होते ही भारतीय फैन्स की उम्मीदें भी टूट गई और टीम इंडिया हारकर बाहर हो चली। इस तरह रन आउट से शुरू हुई धोनी की गाथा संजोग से रन आउट पर ही खत्म हुई। उनके संन्यास लेने पर मैंने कभी नहीं सोचा था कि उसी लम्बे बाल वाले लड़के का क्रिकेट देखते - देखते मैं एक दिन उनके करियर के सफर को यादकर उसे शब्दों में पिरो दूंगा और जब भी धोनी के करियर को सोचता हूँ तो रहमान फारिस की एक पंक्ति याद आती है कि कहानी खत्म हुई, और ऐसे खत्म हुई , कि लोग रोने लगे तालियां बजाते हुए।
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गौतम गंभीर का मानना, धोनी का ये अनोखा रिकॉर्ड हमेशा रहेगा कायम Image Source : GETTY IMAGES/CHENNAIIPL
भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर का मानना है कि बतौर कप्तान एमएस धोनी के 3 ICC ट्रॉफी जीतने के रिकॉर्ड को कोई नहीं तोड़ पाएगा। धोनी ने 15 अगस्त, शनिवार शाम को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास की घोषणा की। इसी के साथ ही इंटरनेशनल क्रिकेट में धोनी युग का अंत हो गया। पिछले एक साल से धोनी के रिटायमेंट की अटकलें चल रही थी जिस पर कल विराम लग गया।
39 वर्षीय धोनी तीन ICC ट्रॉफी जीतने वाले एकमात्र कप्तान हैं। धोनी ने बतौर कप्तान 2011 में 50 ओवर का विश्व कप, 2007 में T20 विश्व कप और चैंपियंस ट्रॉफी (2 बार) का खिताब अपने नाम किया था। यही नहीं, उनकी कप्तानी में भारतीय टीम आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचने में सफल रही।
स्टार स्पोर्ट्स के शो क्रिकेट कनेक्टेड पर धोनी की उपलब्धि के बारें में बात करते हुए गंभीर कहा, "तीनों आईसीसी ट्रॉफी जीतने का कारनामा कोई अन्य भारतीय कप्तान कभी हासिल नहीं कर पाएगा।"
गंभीर ने कहा, "एक रिकॉर्ड की बात करें, जो हमेशा रहने वाला है, तो वो है कप्तान के तौर पर एमएस धोनी का तीन आईसीसी ट्रॉफी जीतना।" गंभीर ने श्रीलंका के खिलाफ 2011 विश्व कप फाइनल के दौरान धोनी के साथ यादगार 109 रनों की साझेदारी की और टीम को खिताब दिलाने में मदद की।
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि कोई अन्य कप्तान कभी भी वो उपलब्धि हासिल कर पाएगा। मुझे लगता है, चाहे वह टी 20 विश्व कप हो, चाहे वह आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी या 2011 विश्व कप हो। मुझे लगता है कि कुछ ऐसा है जो रहने वाला है। हमेशा के लिए और मैं शर्त लगा सकता हूं कि वो रिकॉर्ड हमेशा के लिए रहने वाला है।"
गंभीर ने आगे कहा, "मुझे लगता है कि शतकों का रिकॉर्ड अंततः टूट जाएगा, कोई आएगा और रोहित शर्मा की तुलना में शायद अधिक दोहरे शतक लगाएगा, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय कप्तान के तीन आईसीसी ट्रॉफी हासिल करने के रिकॉर्ड को तोड़ पाएगा। इसलिए एमएस धोनी वहां बने रहेंगे हमेशा के लिए।"
साल 2004 में अपने वनडे करियर की शुरुआत करने वाले धोनी ने अपनी कप्तानी के दम पर भारतीय क्रिकेट का चेहरा बदल कर रख दिया। उन्होंने टीम इंडिया की ओर से 350 वनडे, 90 टेस्ट और 98 T20I मैच खेले।
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